वाराणसी को भारत की ज्ञान राजधानी के रूप में जाना जाता है। शहर में हजारों प्राचीन पांडुलिपियां, ऐतिहासिक पुस्तकालय हैं।
मुख्य बिंदु
- प्राचीन पांडुलिपि परंपरा
- वाराणसी के पुस्तकालय
- पुस्तक बाजार
प्राचीन पांडुलिपि परंपरा
वाराणसी सदियों से प्राचीन ज्ञान का भंडार रहा है। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में 10,000 से अधिक ताड़पत्र और कागज की पांडुलिपियां हैं।
ये पांडुलिपियां वैदिक दर्शन, खगोल विज्ञान, चिकित्सा से लेकर कविता और व्याकरण तक विषयों को कवर करती हैं।
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय
10,000+ पांडुलिपियां। शोधकर्ताओं के लिए अपॉइंटमेंट पर खुला।
पांडुलिपि की आयु
12वीं से 18वीं सदी तक। मुख्य रूप से संस्कृत में।
वाराणसी के पुस्तकालय
सबसे ऐतिहासिक पुस्तकालय केंद्रीय पुस्तकालय (छत्रपति शिवाजी महाराज सरस्वती ग्रंथालय) है, 1891 में स्थापित।
केंद्रीय पुस्तकालय
दशाश्वमेध के पास। सुबह 9 बजे - शाम 5 बजे। मुफ्त प्रवेश। दुर्लभ संग्रह।
बीएचयू पुस्तकालय
एशिया के सबसे बड़े विश्वविद्यालय पुस्तकालयों में से एक।
पुस्तक बाजार
गोदौलिया के आसपास और बीएचयू के पास की गलियों में कई पुस्तक दुकानें हैं। अस्सी घाट के पास रविवार की पुस्तक मंडी किताबों का खजाना है।
रविवार पुस्तक बाजार
अस्सी घाट के पास। सुबह 8 बजे - दोपहर 4 बजे। सस्ते में दुर्लभ किताबें।
गोदौलिया पुस्तक दुकानें
संस्कृत और हिंदी पाठों वाली पारंपरिक पुस्तक दुकानें। कुछ पीढ़ियों से यहां हैं।
त्वरित सुझाव
दशाश्वमेध के पास केंद्रीय पुस्तकालय जाएं (मुफ्त, सुबह 9 बजे - शाम 5 बजे)। अस्सी घाट के पास रविवार पुस्तक बाजार किताब प्रेमियों के लिए जरूरी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या पर्यटक प्राचीन पांडुलिपियां देख सकते हैं?
शोधकर्ता संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में अपॉइंटमेंट द्वारा पांडुलिपियां देख सकते हैं।
पांडुलिपियां किन भाषाओं में हैं?
अधिकांश संस्कृत में हैं, कुछ प्राकृत, हिंदी और फारसी में। लिपियों में देवनागरी, शारदा और बंगाली शामिल हैं।
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