देव दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा (दीवाली के पंद्रह दिन बाद, आमतौर पर नवंबर) को मनाई जाती है, जब देवता गंगा में स्नान करने के लिए पृथ्वी पर उतरते हैं।
मुख्य बिंदु
- इतिहास और किंवदंती
- इसका अनुभव कैसे करें
इतिहास और किंवदंती
देव दीपावली की परंपरा प्राचीन काल की है। किंवदंती है कि भगवान शिव ने इस दिन राक्षस त्रिपुरासुर को हराया।
आधुनिक उत्सव को 1985 में वाराणसी नगर निगम ने पुनर्जीवित किया। 84 घाटों पर 15 लाख से अधिक दीये जलाए जाते हैं।
तिथि
कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर)। दीवाली के पंद्रह दिन बाद।
दीयों की संख्या
84 घाटों पर 15 लाख से अधिक मिट्टी के दीये।
इसका अनुभव कैसे करें
देव दीपावली देखने का सबसे अच्छा तरीका गंगा में नाव से है।
नाव की सवारी
Rs 200-500 प्रति व्यक्ति 1 घंटे की सवारी के लिए।
घाट से दर्शन
घाट की सीढ़ियों पर मुफ्त। शाम 4 बजे तक पहुंचें।
सांस्कृतिक कार्यक्रम
शाम 6 बजे से कई घाटों पर शास्त्रीय संगीत और नृत्य।
त्वरित सुझाव
देव दीपावली कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर) को है। 84 घाटों पर 15 लाख दीये। नाव की सवारी Rs 200-500। अच्छी जगह के लिए शाम 4 बजे तक पहुंचें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या देव दीपावली दीवाली के समान है?
नहीं, देव दीपावली दीवाली के 15 दिन बाद है। दीवाली भगवान राम की वापसी का जश्न है, जबकि देव दीपावली में देवता गंगा में उतरते हैं।
कितनी भीड़ होती है?
अत्यंत भीड़, विशेषकर दशाश्वमेध घाट पर। लाखों आगंतुक आते हैं।
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